17 दिसंबर, 2025 को दो बड़े स्वास्थ्य सेवा कंपनियों — नेफ्रोकेयर हेल्थ सर्विसेज लिमिटेड और पार्क मेडी वर्ल्ड लिमिटेड — ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर अपनी शेयर लिस्टिंग की, लेकिन दोनों का प्रदर्शन धरती-आसमान था। नेफ्रोकेयर ने अपने आईपीओ प्राइस ₹460 के मुकाबले 6.52% प्रीमियम पर ₹490 पर शुरुआत की, जिससे इसकी बाजार पूंजीकरण ₹5,000 करोड़ के पार पहुंच गई। वहीं, पार्क मेडी वर्ल्ड ने ₹162 के आईपीओ प्राइस के मुकाबले 3.95% की गिरावट के साथ ₹155.60 पर लिस्ट होकर निवेशकों को चौंका दिया।
नेफ्रोकेयर: डायलिसिस के बादशाह की जीत
नेफ्रोकेयर हेल्थ सर्विसेज, जो ब्रांड नाम नेफ्रोप्लस के तहत चलती है, भारत और एशिया की सबसे बड़ी डायलिसिस सेवा प्रदाता है। इसके पास भारत के संगठित डायलिसिस बाजार में 50% से अधिक हिस्सा है। इसने ₹871.05 करोड़ का आईपीओ रेज किया — ₹353.40 करोड़ की नई जारी और ₹517.64 करोड़ की बिक्री के माध्यम से। आईपीओ की कीमत बैंड ₹438-460 थी और लॉट साइज 32 शेयर था। इसकी आवेदन 13.96 गुना ओवरसब्सक्राइब हुई, जिससे ₹8,600 करोड़ से अधिक के बोल्स आए।
इसके पहले, नेफ्रोकेयर ने एंकर निवेशकों — जिनमें एसबीआई म्यूचुअल फंड, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, फिडेलिटी फंड्स और एचडीएफसी लाइफ जैसे नाम शामिल हैं — से ₹260 करोड़ जुटाए थे। एनालिस्ट्स के मुताबिक, ₹460 के ऊपरी बैंड पर आईपीओ का EV/EBITDA अनुपात 29 था, जो उद्योग के अन्य प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले उचित माना गया। अनंद राठी ने इसे 60.2 गुना FY25 के लाभ पर वैल्यू किया और 'सब्सक्राइब — लॉन्ग टर्म' रेटिंग दी, लेकिन यह भी कहा कि आईपीओ 'पूरी तरह से प्राइस्ड' है।
पार्क मेडी वर्ल्ड: बड़ा नेटवर्क, छोटा विश्वास
दूसरी ओर, पार्क मेडी वर्ल्ड लिमिटेड ने ₹920 करोड़ जुटाए, जिसमें ₹770 करोड़ की नई जारी और ₹150 करोड़ की बिक्री शामिल थी। इसका आईपीओ बैंड ₹154-162 था और लॉट साइज 92 शेयर था — जिसका न्यूनतम निवेश ₹14,904 था। यह आईपीओ 8.10 गुना ओवरसब्सक्राइब हुई, लेकिन शुरुआती दिनों में निवेशकों की प्रतिक्रिया धीमी रही।
पार्क मेडी वर्ल्ड उत्तर भारत की दूसरी सबसे बड़ी निजी अस्पताल चेन है और हरियाणा में सबसे बड़ी। इसके पास 14 अस्पताल हैं, जिनमें 3,000 से अधिक बिस्तर हैं। सभी अस्पताल NABH से अक्रेडिटेड हैं और आठ NABL से भी। इनमें न्यूरोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, यूरोलॉजी जैसे 30 से अधिक स्पेशलिटी सेवाएं उपलब्ध हैं। FY25 में इसकी आय ₹1,425.97 करोड़ रही, जो पिछले वर्ष की ₹1,263.08 करोड़ की आय की तुलना में 13% बढ़ी है।
हालांकि, बाजार ने इसके बड़े नेटवर्क को देखकर भी विश्वास नहीं किया। ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) लिस्टिंग से पहले गिरता रहा, जबकि नेफ्रोकेयर का GMP बढ़ता गया। यह बात ध्यान देने वाली है कि GMP आधिकारिक डेटा नहीं होता — यह सिर्फ बाजार के अनुमान पर आधारित होता है।
एनालिस्ट्स क्या कह रहे हैं?
अनंद राठी ने नेफ्रोकेयर के लिए एक अहम बिंदु उठाया: इसका 'स्केल लाभ, एसेट-लाइट मॉडल और मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल' इसे ऑपरेशनल दक्षता में आगे ले जाता है। वहीं, गेजोजिट इन्वेस्टमेंट्स के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र FY29 तक 10-12% की CAGR से बढ़ेगा — जिससे पार्क मेडी वर्ल्ड के लिए लंबी अवधि के लिए अच्छे अवसर बने हुए हैं।
लेकिन यहां कुछ अजीब बात है। नेफ्रोकेयर ने दूसरे दिन (11 दिसंबर) केवल 31% सब्सक्रिप्शन प्राप्त किया था, जबकि पार्क मेडी वर्ल्ड को 81% मिल गया था। फिर भी, लिस्टिंग के बाद नेफ्रोकेयर की कीमत ऊपर गई और पार्क की नीचे। यह दर्शाता है कि बाजार सिर्फ नंबरों को नहीं, बल्कि बिजनेस मॉडल को देखता है।
क्यों यह अहम है?
इस लिस्टिंग का मतलब सिर्फ दो कंपनियों के लिए नहीं है। यह भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की निवेश भावना को दर्शाता है। नेफ्रोकेयर की सफलता से पता चलता है कि निवेशक उन कंपनियों को चुन रहे हैं जो एक विशिष्ट बाजार में अपनी श्रेष्ठता बनाए हुए हैं — चाहे वह डायलिसिस हो या अस्पताल चेन। पार्क मेडी वर्ल्ड की कमजोर लिस्टिंग यह बताती है कि बड़ा होना ही काफी नहीं है। अगर बिजनेस मॉडल में अस्थिरता है, तो बाजार उसे अनदेखा कर देता है।
इसके अलावा, यह दिखाता है कि निवेशक अब सिर्फ रिवेन्यू या बेड कैपेसिटी नहीं देख रहे। वे देख रहे हैं कि कंपनी किस तरह अपनी लागत को कम कर रही है, क्या उसके पास स्केल का फायदा है, और क्या उसकी व्यवस्था स्थायी है।
अगले कदम क्या हैं?
नेफ्रोकेयर अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में नए डायलिसिस सेंटर खोलने की योजना बना रही है। यह अस्पतालों के साथ पार्टनरशिप के माध्यम से अपनी पहुंच बढ़ाएगा। पार्क मेडी वर्ल्ड ने अपनी बिक्री में वृद्धि दिखाई है, लेकिन अब उसे लाभदायकता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। अगर यह अपनी ऑपरेशनल दक्षता में सुधार करता है, तो शायद अगले साल बाजार इसे फिर से देखे।
दोनों कंपनियों के लिए आईपीओ एक शुरुआत है। लेकिन अब जो असली चुनौती है — वह है बाजार के विश्वास को बनाए रखना।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नेफ्रोकेयर की लिस्टिंग इतनी सफल क्यों हुई?
नेफ्रोकेयर की सफलता इसके एकाधिकार जैसे स्थान के कारण हुई — भारत में डायलिसिस के लिए 50% से अधिक बाजार इसके पास है। इसका एसेट-लाइट मॉडल, नियमित उपचार प्रोटोकॉल और टियर-2/3 शहरों में विस्तार की योजना निवेशकों के लिए लंबी अवधि का आकर्षण बनी। एनालिस्ट्स ने इसे 'पूरी तरह से प्राइस्ड' कहा, लेकिन फिर भी बाजार ने इसकी दक्षता को समझा।
पार्क मेडी वर्ल्ड की लिस्टिंग में कमजोरी क्यों दिखी?
हालांकि पार्क मेडी वर्ल्ड के पास 3,000 बिस्तर और 14 अस्पताल हैं, लेकिन इसकी ऑपरेशनल मार्जिन और लाभदायकता के बारे में सवाल थे। निवेशकों को लगा कि इसकी बड़ी लागत और अस्पताल चलाने की जटिलता के कारण लाभ बढ़ाना मुश्किल होगा। ग्रे मार्केट प्रीमियम का गिरना भी इसी अनिश्चितता का संकेत था।
आईपीओ में एंकर निवेशकों की भूमिका क्या है?
एंकर निवेशक आईपीओ से पहले बड़ी राशि निवेश करके बाजार को विश्वास दिलाते हैं। नेफ्रोकेयर ने SBI, ICICI, HDFC जैसे विश्वसनीय फंड्स से ₹260 करोड़ जुटाए, जिससे छोटे निवेशकों को यकीन हुआ कि यह कंपनी ठोस है। पार्क मेडी वर्ल्ड के पास केवल ₹100 करोड़ का कार्नेलियन इन्वेस्टमेंट था, जो इस तरह के विश्वास को बढ़ाने में कम प्रभावी रहा।
इस लिस्टिंग से भारतीय स्वास्थ्य सेक्टर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
यह दो अलग दृष्टिकोण दिखाता है: एक तरफ विशिष्ट सेवा पर फोकस (नेफ्रोकेयर), दूसरी तरफ विस्तार पर (पार्क मेडी)। भविष्य में निवेशक ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता देंगे जो बाजार में अपनी श्रेष्ठता बनाए रखें। यह बाजार को अधिक विश्लेषणात्मक बनाता है — सिर्फ आकार नहीं, बल्कि दक्षता और लाभदायकता भी मायने रखती है।
नेफ्रोकेयर और पार्क मेडी वर्ल्ड के बीच क्या अंतर है?
नेफ्रोकेयर एक विशिष्ट सेवा (डायलिसिस) के लिए स्पेशलाइज्ड है और इसका मॉडल हल्का और अधिक लाभदायक है। पार्क मेडी वर्ल्ड एक बड़ा अस्पताल चेन है, जिसमें लागत ज्यादा है और ऑपरेशनल जटिलता अधिक है। नेफ्रोकेयर का बिजनेस मॉडल अधिक स्केलेबल है, जबकि पार्क का बड़ा होने का दावा अभी तक लाभ के रूप में नहीं बदल पाया।
क्या आईपीओ की लिस्टिंग निवेशकों के लिए अच्छा संकेत है?
हां, लेकिन शर्त पर। नेफ्रोकेयर की सफलता बताती है कि अगर कंपनी के पास एक अनूठी स्थिति है, तो बाजार उसे बहुत ज्यादा वैल्यू देता है। पार्क मेडी की गिरावट यह सिखाती है कि बड़ा होना ही काफी नहीं — बिजनेस मॉडल की गुणवत्ता भी जरूरी है। निवेशकों को अब एक नए तरीके से आईपीओ देखना होगा।
Mukesh Kumar
दिसंबर 19, 2025 AT 00:05Govind Vishwakarma
दिसंबर 20, 2025 AT 05:06Shankar Kathir
दिसंबर 21, 2025 AT 06:12RAJA SONAR
दिसंबर 23, 2025 AT 04:08Senthil Kumar
दिसंबर 24, 2025 AT 15:17Shraddhaa Dwivedi
दिसंबर 26, 2025 AT 07:21Saileswar Mahakud
दिसंबर 27, 2025 AT 02:49Harsh Gujarathi
दिसंबर 28, 2025 AT 15:51Rakesh Pandey
दिसंबर 29, 2025 AT 20:41Bhoopendra Dandotiya
दिसंबर 31, 2025 AT 09:40Jamal Baksh
दिसंबर 31, 2025 AT 15:53Rahul Sharma
जनवरी 1, 2026 AT 04:54Govind Vishwakarma
जनवरी 2, 2026 AT 19:44aneet dhoka
जनवरी 3, 2026 AT 00:08