नेफ्रोकेयर ने 6.52% प्रीमियम पर लिस्टिंग की, पार्क मेडी वर्ल्ड में 3.95% की गिरावट

नेफ्रोकेयर ने 6.52% प्रीमियम पर लिस्टिंग की, पार्क मेडी वर्ल्ड में 3.95% की गिरावट

Aswin Yoga
दिसंबर 18, 2025

17 दिसंबर, 2025 को दो बड़े स्वास्थ्य सेवा कंपनियों — नेफ्रोकेयर हेल्थ सर्विसेज लिमिटेड और पार्क मेडी वर्ल्ड लिमिटेड — ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर अपनी शेयर लिस्टिंग की, लेकिन दोनों का प्रदर्शन धरती-आसमान था। नेफ्रोकेयर ने अपने आईपीओ प्राइस ₹460 के मुकाबले 6.52% प्रीमियम पर ₹490 पर शुरुआत की, जिससे इसकी बाजार पूंजीकरण ₹5,000 करोड़ के पार पहुंच गई। वहीं, पार्क मेडी वर्ल्ड ने ₹162 के आईपीओ प्राइस के मुकाबले 3.95% की गिरावट के साथ ₹155.60 पर लिस्ट होकर निवेशकों को चौंका दिया।

नेफ्रोकेयर: डायलिसिस के बादशाह की जीत

नेफ्रोकेयर हेल्थ सर्विसेज, जो ब्रांड नाम नेफ्रोप्लस के तहत चलती है, भारत और एशिया की सबसे बड़ी डायलिसिस सेवा प्रदाता है। इसके पास भारत के संगठित डायलिसिस बाजार में 50% से अधिक हिस्सा है। इसने ₹871.05 करोड़ का आईपीओ रेज किया — ₹353.40 करोड़ की नई जारी और ₹517.64 करोड़ की बिक्री के माध्यम से। आईपीओ की कीमत बैंड ₹438-460 थी और लॉट साइज 32 शेयर था। इसकी आवेदन 13.96 गुना ओवरसब्सक्राइब हुई, जिससे ₹8,600 करोड़ से अधिक के बोल्स आए।

इसके पहले, नेफ्रोकेयर ने एंकर निवेशकों — जिनमें एसबीआई म्यूचुअल फंड, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, फिडेलिटी फंड्स और एचडीएफसी लाइफ जैसे नाम शामिल हैं — से ₹260 करोड़ जुटाए थे। एनालिस्ट्स के मुताबिक, ₹460 के ऊपरी बैंड पर आईपीओ का EV/EBITDA अनुपात 29 था, जो उद्योग के अन्य प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले उचित माना गया। अनंद राठी ने इसे 60.2 गुना FY25 के लाभ पर वैल्यू किया और 'सब्सक्राइब — लॉन्ग टर्म' रेटिंग दी, लेकिन यह भी कहा कि आईपीओ 'पूरी तरह से प्राइस्ड' है।

पार्क मेडी वर्ल्ड: बड़ा नेटवर्क, छोटा विश्वास

दूसरी ओर, पार्क मेडी वर्ल्ड लिमिटेड ने ₹920 करोड़ जुटाए, जिसमें ₹770 करोड़ की नई जारी और ₹150 करोड़ की बिक्री शामिल थी। इसका आईपीओ बैंड ₹154-162 था और लॉट साइज 92 शेयर था — जिसका न्यूनतम निवेश ₹14,904 था। यह आईपीओ 8.10 गुना ओवरसब्सक्राइब हुई, लेकिन शुरुआती दिनों में निवेशकों की प्रतिक्रिया धीमी रही।

पार्क मेडी वर्ल्ड उत्तर भारत की दूसरी सबसे बड़ी निजी अस्पताल चेन है और हरियाणा में सबसे बड़ी। इसके पास 14 अस्पताल हैं, जिनमें 3,000 से अधिक बिस्तर हैं। सभी अस्पताल NABH से अक्रेडिटेड हैं और आठ NABL से भी। इनमें न्यूरोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, यूरोलॉजी जैसे 30 से अधिक स्पेशलिटी सेवाएं उपलब्ध हैं। FY25 में इसकी आय ₹1,425.97 करोड़ रही, जो पिछले वर्ष की ₹1,263.08 करोड़ की आय की तुलना में 13% बढ़ी है।

हालांकि, बाजार ने इसके बड़े नेटवर्क को देखकर भी विश्वास नहीं किया। ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) लिस्टिंग से पहले गिरता रहा, जबकि नेफ्रोकेयर का GMP बढ़ता गया। यह बात ध्यान देने वाली है कि GMP आधिकारिक डेटा नहीं होता — यह सिर्फ बाजार के अनुमान पर आधारित होता है।

एनालिस्ट्स क्या कह रहे हैं?

अनंद राठी ने नेफ्रोकेयर के लिए एक अहम बिंदु उठाया: इसका 'स्केल लाभ, एसेट-लाइट मॉडल और मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल' इसे ऑपरेशनल दक्षता में आगे ले जाता है। वहीं, गेजोजिट इन्वेस्टमेंट्स के अनुसार, भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र FY29 तक 10-12% की CAGR से बढ़ेगा — जिससे पार्क मेडी वर्ल्ड के लिए लंबी अवधि के लिए अच्छे अवसर बने हुए हैं।

लेकिन यहां कुछ अजीब बात है। नेफ्रोकेयर ने दूसरे दिन (11 दिसंबर) केवल 31% सब्सक्रिप्शन प्राप्त किया था, जबकि पार्क मेडी वर्ल्ड को 81% मिल गया था। फिर भी, लिस्टिंग के बाद नेफ्रोकेयर की कीमत ऊपर गई और पार्क की नीचे। यह दर्शाता है कि बाजार सिर्फ नंबरों को नहीं, बल्कि बिजनेस मॉडल को देखता है।

क्यों यह अहम है?

इस लिस्टिंग का मतलब सिर्फ दो कंपनियों के लिए नहीं है। यह भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की निवेश भावना को दर्शाता है। नेफ्रोकेयर की सफलता से पता चलता है कि निवेशक उन कंपनियों को चुन रहे हैं जो एक विशिष्ट बाजार में अपनी श्रेष्ठता बनाए हुए हैं — चाहे वह डायलिसिस हो या अस्पताल चेन। पार्क मेडी वर्ल्ड की कमजोर लिस्टिंग यह बताती है कि बड़ा होना ही काफी नहीं है। अगर बिजनेस मॉडल में अस्थिरता है, तो बाजार उसे अनदेखा कर देता है।

इसके अलावा, यह दिखाता है कि निवेशक अब सिर्फ रिवेन्यू या बेड कैपेसिटी नहीं देख रहे। वे देख रहे हैं कि कंपनी किस तरह अपनी लागत को कम कर रही है, क्या उसके पास स्केल का फायदा है, और क्या उसकी व्यवस्था स्थायी है।

अगले कदम क्या हैं?

नेफ्रोकेयर अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में नए डायलिसिस सेंटर खोलने की योजना बना रही है। यह अस्पतालों के साथ पार्टनरशिप के माध्यम से अपनी पहुंच बढ़ाएगा। पार्क मेडी वर्ल्ड ने अपनी बिक्री में वृद्धि दिखाई है, लेकिन अब उसे लाभदायकता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। अगर यह अपनी ऑपरेशनल दक्षता में सुधार करता है, तो शायद अगले साल बाजार इसे फिर से देखे।

दोनों कंपनियों के लिए आईपीओ एक शुरुआत है। लेकिन अब जो असली चुनौती है — वह है बाजार के विश्वास को बनाए रखना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नेफ्रोकेयर की लिस्टिंग इतनी सफल क्यों हुई?

नेफ्रोकेयर की सफलता इसके एकाधिकार जैसे स्थान के कारण हुई — भारत में डायलिसिस के लिए 50% से अधिक बाजार इसके पास है। इसका एसेट-लाइट मॉडल, नियमित उपचार प्रोटोकॉल और टियर-2/3 शहरों में विस्तार की योजना निवेशकों के लिए लंबी अवधि का आकर्षण बनी। एनालिस्ट्स ने इसे 'पूरी तरह से प्राइस्ड' कहा, लेकिन फिर भी बाजार ने इसकी दक्षता को समझा।

पार्क मेडी वर्ल्ड की लिस्टिंग में कमजोरी क्यों दिखी?

हालांकि पार्क मेडी वर्ल्ड के पास 3,000 बिस्तर और 14 अस्पताल हैं, लेकिन इसकी ऑपरेशनल मार्जिन और लाभदायकता के बारे में सवाल थे। निवेशकों को लगा कि इसकी बड़ी लागत और अस्पताल चलाने की जटिलता के कारण लाभ बढ़ाना मुश्किल होगा। ग्रे मार्केट प्रीमियम का गिरना भी इसी अनिश्चितता का संकेत था।

आईपीओ में एंकर निवेशकों की भूमिका क्या है?

एंकर निवेशक आईपीओ से पहले बड़ी राशि निवेश करके बाजार को विश्वास दिलाते हैं। नेफ्रोकेयर ने SBI, ICICI, HDFC जैसे विश्वसनीय फंड्स से ₹260 करोड़ जुटाए, जिससे छोटे निवेशकों को यकीन हुआ कि यह कंपनी ठोस है। पार्क मेडी वर्ल्ड के पास केवल ₹100 करोड़ का कार्नेलियन इन्वेस्टमेंट था, जो इस तरह के विश्वास को बढ़ाने में कम प्रभावी रहा।

इस लिस्टिंग से भारतीय स्वास्थ्य सेक्टर पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

यह दो अलग दृष्टिकोण दिखाता है: एक तरफ विशिष्ट सेवा पर फोकस (नेफ्रोकेयर), दूसरी तरफ विस्तार पर (पार्क मेडी)। भविष्य में निवेशक ऐसी कंपनियों को प्राथमिकता देंगे जो बाजार में अपनी श्रेष्ठता बनाए रखें। यह बाजार को अधिक विश्लेषणात्मक बनाता है — सिर्फ आकार नहीं, बल्कि दक्षता और लाभदायकता भी मायने रखती है।

नेफ्रोकेयर और पार्क मेडी वर्ल्ड के बीच क्या अंतर है?

नेफ्रोकेयर एक विशिष्ट सेवा (डायलिसिस) के लिए स्पेशलाइज्ड है और इसका मॉडल हल्का और अधिक लाभदायक है। पार्क मेडी वर्ल्ड एक बड़ा अस्पताल चेन है, जिसमें लागत ज्यादा है और ऑपरेशनल जटिलता अधिक है। नेफ्रोकेयर का बिजनेस मॉडल अधिक स्केलेबल है, जबकि पार्क का बड़ा होने का दावा अभी तक लाभ के रूप में नहीं बदल पाया।

क्या आईपीओ की लिस्टिंग निवेशकों के लिए अच्छा संकेत है?

हां, लेकिन शर्त पर। नेफ्रोकेयर की सफलता बताती है कि अगर कंपनी के पास एक अनूठी स्थिति है, तो बाजार उसे बहुत ज्यादा वैल्यू देता है। पार्क मेडी की गिरावट यह सिखाती है कि बड़ा होना ही काफी नहीं — बिजनेस मॉडल की गुणवत्ता भी जरूरी है। निवेशकों को अब एक नए तरीके से आईपीओ देखना होगा।

14 टिप्पणि

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    Mukesh Kumar

    दिसंबर 19, 2025 AT 00:05
    ये दोनों कंपनियां एक दूसरे के बिल्कुल उलट हैं। नेफ्रोकेयर ने साबित कर दिया कि स्पेशलिटी में डॉमिनेंस बहुत ज्यादा कमाल करता है। पार्क मेडी के पास बिस्तर तो हैं पर लाभ का दिमाग नहीं।
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    Govind Vishwakarma

    दिसंबर 20, 2025 AT 05:06
    GMP गिरा तो आपने देखा ना ये बात बाजार का दिमाग है ना कि रिपोर्ट का ये वो जगह है जहां आपकी बड़ी बातें बेकार हो जाती हैं अगर आपका मॉडल नहीं चल रहा
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    Shankar Kathir

    दिसंबर 21, 2025 AT 06:12
    मैंने तो नेफ्रोकेयर के एसेट-लाइट मॉडल को देखकर ही अंदाजा लगा लिया था कि ये लिस्टिंग जबरदस्त होगी। डायलिसिस सेंटर बनाने में लाखों नहीं लगते बस ट्रेनिंग और प्रोटोकॉल चाहिए। पार्क मेडी के पास बिल्डिंग हैं लेकिन उनके ऊपर लोड बहुत ज्यादा है। एक अस्पताल चलाना एक छोटे शहर के लिए एक बड़ी बिजनेस है लेकिन इसे स्केल करना एक अलग खेल है। नेफ्रोकेयर ने बस एक चीज़ को बहुत अच्छे से किया और बाकी सब उसके ऊपर बन गया।
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    RAJA SONAR

    दिसंबर 23, 2025 AT 04:08
    क्या ये सब लोग नेफ्रोकेयर के बारे में बात कर रहे हैं ये तो एक डायलिसिस कंपनी है ना निवेशकों का दिमाग बदल गया है क्या अब बड़ा होना बेकार है ये तो बस एक लिक्विड एसेट का नाम है
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    Senthil Kumar

    दिसंबर 24, 2025 AT 15:17
    gmp gira tha par phir bhi ipo over subscribed hua.. market ki soch badal rhi hai
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    Shraddhaa Dwivedi

    दिसंबर 26, 2025 AT 07:21
    मैंने अपने दादाजी को डायलिसिस के लिए नेफ्रोप्लस ले जाया था। वहां का सिस्टम इतना स्मूथ था कि लगा जैसे अस्पताल में नहीं बल्कि एक बहुत अच्छे स्पा में हूं। ये जो बात है वो बस नंबर्स की नहीं बल्कि एक्सपीरियंस की है।
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    Saileswar Mahakud

    दिसंबर 27, 2025 AT 02:49
    पार्क मेडी के बारे में तो मैंने सुना था कि उनके अस्पतालों में नर्सिंग स्टाफ बहुत अच्छा है। लेकिन जब आप बड़े होते हैं तो एक छोटी गलती भी बड़ी बात बन जाती है। शायद उनकी ऑपरेशनल इफिशिएंसी अभी तक ठीक नहीं हुई।
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    Harsh Gujarathi

    दिसंबर 28, 2025 AT 15:51
    नेफ्रोकेयर = 💪 पार्क मेडी = 😅 बाजार ने समझ लिया कि कौन सी कंपनी असली जीत ले रही है। अब देखते हैं कौन अपना मॉडल सुधारता है।
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    Rakesh Pandey

    दिसंबर 29, 2025 AT 20:41
    इतनी बड़ी बातें लिखी हैं पर एक बात भूल गए ये सब निवेशक अब फंड मैनेजर्स के लिए नहीं बल्कि अपने घर के लिए निवेश कर रहे हैं। अगर आपका मॉडल स्केलेबल है तो आपकी बात चलती है
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    Bhoopendra Dandotiya

    दिसंबर 31, 2025 AT 09:40
    क्या आपने कभी सोचा है कि नेफ्रोकेयर जैसी कंपनी ने डायलिसिस को एक आम चीज़ बना दिया है। जैसे जीएसटी या ऑनलाइन बैंकिंग। इसने एक बीमारी को एक सेवा में बदल दिया। जबकि पार्क मेडी अभी भी अस्पताल को एक जगह के रूप में देख रहा है। एक जगह जहां लोग आते हैं और जाते हैं। ये फर्क जानना जरूरी है।
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    Jamal Baksh

    दिसंबर 31, 2025 AT 15:53
    इस लिस्टिंग के बाद भारतीय बाजार का एक नया मानक स्थापित हो गया है। अब निवेशक बस बड़ा होने की तलाश नहीं करेंगे। वे देखेंगे कि क्या आपका मॉडल दक्ष है। ये एक बहुत बड़ी बात है।
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    Rahul Sharma

    जनवरी 1, 2026 AT 04:54
    नेफ्रोकेयर के एंकर इन्वेस्टर्स ने जो विश्वास दिखाया वो बहुत महत्वपूर्ण था। एसबीआई और आईसीआईसीआई जैसे नामों के साथ आना छोटे निवेशकों के लिए एक रिलायबिलिटी बिल्ट इन था। पार्क मेडी के पास ऐसा कुछ नहीं था। ये बात भी बहुत महत्वपूर्ण है।
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    Govind Vishwakarma

    जनवरी 2, 2026 AT 19:44
    अनंद राठी के बारे में क्या कहना है ये तो बस एक एनालिस्ट है जिसने अपने ब्लॉग पर एक बार लिख दिया और अब लोग उसे गॉड मान रहे हैं। बाजार ने खुद फैसला किया ना आपके रिपोर्ट्स को नहीं
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    aneet dhoka

    जनवरी 3, 2026 AT 00:08
    ये सब एक गुप्त योजना है। नेफ्रोकेयर को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा फंड ने ग्रे मार्केट में फेक डिमांड बनाई है। जब आप देखेंगे तो पार्क मेडी के शेयर अगले साल तीन गुना हो जाएंगे। ये सब एक बड़ा फैक्टरी है। अब तो बाजार भी बूढ़ा हो गया है और अब लोगों को लगता है कि जो बड़ा है वो अच्छा है।

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