23 जून 2026 को नई दिल्ली में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसी अंतरिम आदेश जारी किया जिसने कानूनी हलचल को फिर से शुरू कर दिया। कोर्ट ने मुहम्मद राशिद खान, जिन्हें 1993 के बौबाजार धमाका के मुख्य दूषित और 'सरगना' माना जाता है, की समय से पहले रिहाई के लिए दिए गए दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। यह मामला उन 70 लोगों की याद ताजा करता है जो उस घातक विस्फोट में मारे गए थे।
यहाँ बात सिर्फ़ एक कैदी की रिहाई की नहीं है, बल्कि इस बात की भी है कि क्या तीन दशकों से जेल में पड़े आतंकवादी अपराध के दोषी को आज़ाद किया जाना चाहिए? पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि ऐसे गंभीर अपराध में सजा भुगत रहे व्यक्ति को छोड़ा नहीं जाना चाहिए। अब बारी है सुप्रीम कोर्ट की, जो इस मामले में अंतिम फैसला सुनाने वाली है।
अदालत की कार्रवाई और पृष्ठभूमि
जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस सنجय साखलेचा की पीठ ने यह आदेश सुनाया। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को स्थगित कर दिया था, जिसमें मुहम्मद राशिद खान की रिहाई की अनुमति दी गई थी। राशिद खान, जो अब 77 वर्ष के हैं, पिछले 33 सालों से जेल में कैद हैं। उनकी सजा TADA (आतंकवाद और विध्वंसक गतिविधि निवारण अधिनियम) के तहत लगी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने राशिद खान को 'मास्टरमाइंड' और 'सरगना' बताया। अदालत ने कहा कि वह केवल एक सहभागी नहीं, बल्कि इस योजना का मस्ती-मंडल था। इस कारण से ही कोर्ट ने राज्य सरकार के आवेदन पर गंभीरता से विचार करने का निर्णय लिया।
पश्चिम बंगाल सरकार का रुख
पश्चिम बंगाल सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद जैसे 'घातक अपराध' में दोषी व्यक्ति को समय से पहले रिहा नहीं किया जाना चाहिए। सरकार ने तर्क दिया कि जब तक सजा पूरी न हो जाए, तब तक किसी भी तरह की छूट देना न्याय के खिलाफ होगा।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि वह दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करे। उनके अनुसार, राशिद खान की रिहाई समाज में असंतोष और भय का कारण बन सकती है, खासकर इसलिए क्योंकि यह मामला साम्प्रदायिक हिंसा से जुड़ा हुआ था।
1993 के बौबाजार धमाके की कहानी
1993 में कोलकाता के बौबाजार क्षेत्र में हुए इस विस्फोट ने पूरे शहर को हिला कर रख दिया था। इस धमाके में लगभग 70 लोग मारे गए थे और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए थे। यह कोलकाता के इतिहास के सबसे खूंखार हमलों में से एक माना जाता है।
राशिद खान, जो वहां सट्टे के खेल चलाते थे, को बाद में डॉन दाऊद इब्राहिम से जुड़ा पाया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस समय के एक संघर्ष की बदला लेने के लिए यह धमाका किया गया था। राशिद खान ने कबूल किया था कि वे बम बनाने वाले थे।
कानूनी पहलू और भविष्य की राह
अब प्रश्न यह उठा है कि क्या आयु और लंबी कैद की अवधि के आधार पर रिहाई दी जानी चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने अभी केवल अंतरिम रोक लगाई है। अंतिम फैसला तब आएगा जब दोनों पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी।
विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट सख्त रुख अपना सकता है, क्योंकि यह मामला आतंकवाद से जुड़ा है। दूसरी ओर, मानवाधिकार समूहों का कहना है कि 33 साल की कैद काफी लंबी अवधि है।
Frequently Asked Questions
मुहम्मद राशिद खान कौन हैं?
मुहम्मद राशिद खान 1993 के बौबाजार धमाके के मुख्य दोषी हैं। उन्हें 'सरगना' और 'मास्टरमाइंड' कहा जाता है। वे 77 वर्ष के हैं और पिछले 33 सालों से जेल में हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रोक लगाई?
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के आवेदन पर दिल्ली हाईकोर्ट के रिहाई आदेश पर अंतरिम रोक लगाई। कोर्ट ने राशिद खान को आतंकवादी अपराध का मुख्य दोषी माना।
1993 के धमाके में कितने लोग मारे गए थे?
1993 के बौबाजार धमाके में लगभग 70 लोगों की मौत हुई थी। यह कोलकाता के सबसे घातक हमलों में से एक था जिसमें बहुत संपत्ति का नुकसान भी हुआ था।
अब आगे क्या होगा?
अब सुप्रीम कोर्ट में पूर्ण सुनवाई होगी। कोर्ट अंतिम फैसला सुनाएगा कि क्या राशिद खान को रिहा किया जाना चाहिए या नहीं। इसका निर्णय उनकी आयु, कैद की अवधि और अपराध की गंभीरता पर निर्भर करेगा।